UNEP Emissions Gap Report 2026: 1.5°C लक्ष्य, मुख्य निष्कर्ष और भारत की भूमिका
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) आज पूरी दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है। बढ़ता तापमान, गर्मी की लहरें, बाढ़, सूखा और जंगलों में आग जैसी घटनाएँ पर्यावरण के साथ-साथ लोगों के जीवन और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करती हैं। इन समस्याओं को कम करने के लिए दुनिया के देशों को ग्रीनहाउस गैसों (Greenhouse Gases) का उत्सर्जन तेजी से घटाना होगा।
इसी विषय पर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी United Nations Environment Programme (UNEP) ने Emissions Gap Report 2026 जारी की है। इस रिपोर्ट का शीर्षक है “The Point of Return: Urgent Emissions Cuts Needed to Come Back from Overshoot of 1.5°C”। आसान भाषा में इसका अर्थ है कि दुनिया को तापमान में 1.5°C से अधिक बढ़ोतरी के बाद भी उसे सीमित करने और सदी के अंत तक वापस नीचे लाने के लिए उत्सर्जन में तेजी से कटौती करनी होगी।
UNEP Emissions Gap Report 2026 चर्चा में क्यों है?
UNEP की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में वैश्विक औसत तापमान में बढ़ोतरी को 1.5°C तक सीमित रखने का लक्ष्य बिना या बहुत कम समय के लिए सीमा पार किए हासिल करना अब संभव नहीं दिख रहा है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के प्रयास बेकार हो गए हैं। अब जरूरी है कि तापमान कितनी अधिक सीमा तक बढ़ेगा और कितने समय तक ऊँचा रहेगा, इसे कम किया जाए। रिपोर्ट में ऐसा रास्ता भी बताया गया है, जिसके तहत सदी के अंत तक तापमान को फिर से 1.5°C या उससे नीचे लाने की लगभग 50% संभावना हो सकती है।
यह रिपोर्ट नवंबर 2026 में तुर्किये के अंताल्या में होने वाले COP31 जलवायु सम्मेलन से पहले महत्वपूर्ण है।
Emissions Gap Report क्या है?
Emissions Gap Report (EGR) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की वार्षिक रिपोर्ट है। इसमें बताया जाता है कि दुनिया के देश जितना ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने का वादा कर रहे हैं और मौजूदा नीतियों से जितनी कमी होने की उम्मीद है, वह जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है या नहीं।
सरल शब्दों में, उत्सर्जन में जितनी कटौती वास्तव में जरूरी है और देशों की योजनाओं से जितनी कटौती होने की संभावना है, उनके बीच का अंतर ही Emissions Gap यानी उत्सर्जन अंतर कहलाता है।
रिपोर्ट के 5 सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष
1. दुनिया का तापमान 1.5°C से ऊपर जा सकता है
Paris Agreement के अंतर्गत दुनिया ने वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से काफी नीचे रखने और 1.5°C तक सीमित करने के प्रयास करने का लक्ष्य रखा था। लेकिन मौजूदा नीतियों और उत्सर्जन की गति के कारण 1.5°C की सीमा पार होने की आशंका है।
UNEP के सबसे कम संभावित ओवरशूट वाले रास्ते में तापमान लगभग मध्य सदी तक 1.7°C से 1.8°C के स्तर पर पहुँच सकता है। यदि इसके बाद उत्सर्जन में लगातार और गहरी कटौती की जाए, तो वर्ष 2100 तक तापमान को 1.5°C या उससे नीचे वापस लाने की लगभग 50% संभावना बताई गई है।
Overshoot का अर्थ: जब वैश्विक तापमान किसी तय सीमा, जैसे 1.5°C, से कुछ समय के लिए ऊपर चला जाता है और बाद में उसे नीचे लाने का प्रयास किया जाता है, तो इसे Temperature Overshoot कहा जाता है।
2. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कितनी कटौती जरूरी है?
रिपोर्ट के सबसे कम ओवरशूट वाले रास्ते के अनुसार, वर्ष 2025 के स्तर की तुलना में दुनिया को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में बड़ी कटौती करनी होगी।
| वर्ष | उत्सर्जन में आवश्यक कमी |
|---|---|
| 2030 | 18% |
| 2035 | 45% |
| 2040 | 69% |
ध्यान दें: ये आंकड़े 2025 के उत्सर्जन स्तर की तुलना में हैं। ये उस रास्ते के लिए जरूरी कटौती हैं, जिसमें तापमान के 1.5°C से ऊपर जाने की अवधि और सीमा को न्यूनतम रखने का प्रयास किया जाता है। ये मौजूदा योजनाओं से हासिल होने वाली सुनिश्चित कटौती नहीं हैं।
3. मौजूदा नीतियों से तापमान कितना बढ़ सकता है?
UNEP की रिपोर्ट अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर भविष्य में वैश्विक तापमान वृद्धि का अनुमान देती है।
| स्थिति | सदी के अंत तक अनुमानित तापमान वृद्धि |
|---|---|
| मौजूदा नीतियाँ जारी रहने पर | लगभग 2.8°C |
| देशों के सभी NDC लक्ष्यों को लागू करने पर | लगभग 2.6°C |
| NDC लक्ष्यों के साथ अतिरिक्त Net Zero लक्ष्य पूरे होने पर | लगभग 2.1°C |
इन आंकड़ों से पता चलता है कि केवल मौजूदा नीतियों और वादों के सहारे पेरिस समझौते के तापमान लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल है। देशों को अपनी योजनाओं को मजबूत करने के साथ उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी करना होगा।
4. Carbon Dioxide Removal की भी जरूरत होगी
कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है। इसे वातावरण से हटाने और लंबे समय तक सुरक्षित रखने की प्रक्रिया को Carbon Dioxide Removal (CDR) कहा जाता है। इसमें कुछ प्राकृतिक उपाय और कुछ तकनीकी तरीके शामिल हो सकते हैं।
UNEP के अनुसार, सबसे कम ओवरशूट वाले रास्ते में इस सदी के दौरान लगभग 320 गीगाटन CO₂ को वातावरण से हटाकर स्थायी रूप से संग्रहित करने की जरूरत पड़ सकती है।
इतनी बड़ी मात्रा में कार्बन हटाना तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है। इसलिए भविष्य की कार्बन हटाने वाली तकनीकों पर निर्भर रहने के बजाय आज ही उत्सर्जन घटाना जरूरी है।
5. Renewable Energy बढ़ाना जरूरी, लेकिन अकेले पर्याप्त नहीं
सौर ऊर्जा (Solar Energy) और पवन ऊर्जा (Wind Energy) जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग दुनिया में तेजी से बढ़ा है। इनसे बिजली बनाने के दौरान कोयले और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
लेकिन केवल सौर और पवन ऊर्जा बढ़ाने से जलवायु समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। इसके लिए दूसरे क्षेत्रों में भी बदलाव जरूरी हैं:
- ऊर्जा की बर्बादी कम करना और Energy Efficiency बढ़ाना।
- कोयला, तेल और गैस पर निर्भरता धीरे-धीरे कम करना।
- मीथेन जैसी अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाना।
- जंगलों की कटाई रोकना और खराब हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करना।
- परिवहन, उद्योग, भवन और कृषि क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करना।
भारत के लिए UNEP रिपोर्ट का क्या महत्व है?
भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा की मांग बढ़ रही है। देश को उद्योगों, परिवहन, घरों और बुनियादी ढाँचे के लिए अधिक ऊर्जा की जरूरत है। इसके साथ ही प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना भी जरूरी है।
भारत के लिए मुख्य चुनौती विकास की जरूरतों को पूरा करते हुए स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, ऊर्जा दक्षता सुधारना और उत्सर्जन की वृद्धि को सीमित करना है।
भारत की प्रमुख योजनाएँ और पहल
1. National Action Plan on Climate Change (NAPCC)
यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत की प्रमुख राष्ट्रीय रूपरेखाओं में से एक है। इसके अंतर्गत ऊर्जा, जल, कृषि और अन्य क्षेत्रों से जुड़ी विभिन्न पहल शामिल हैं।
2. National Solar Mission
इसका उद्देश्य देश में सौर ऊर्जा के विकास और उपयोग को बढ़ावा देना है। सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन में जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
3. National Green Hydrogen Mission
इस मिशन का उद्देश्य ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और उससे जुड़ी तकनीकों को बढ़ावा देना है। ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग भविष्य में कुछ ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों में मदद कर सकता है, जहाँ उत्सर्जन कम करना कठिन है।
4. Carbon Credit Trading Scheme (CCTS)
कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम भारत में कार्बन बाजार के विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य निर्धारित ढाँचे के अनुसार उत्सर्जन कम करने के लिए प्रोत्साहन तैयार करना है। इसकी सफलता के लिए पारदर्शी निगरानी और विश्वसनीय उत्सर्जन आंकड़े जरूरी हैं।
5. PM Surya Ghar: Muft Bijli Yojana
यह योजना घरों में रूफटॉप सोलर यानी छत पर सौर ऊर्जा प्रणाली लगाने को बढ़ावा देती है। इससे पात्र परिवार अपनी बिजली की जरूरत का एक हिस्सा सौर ऊर्जा से पूरा कर सकते हैं।
6. Perform, Achieve and Trade (PAT) Scheme
यह योजना निर्धारित औद्योगिक क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता सुधारने के लिए बनाई गई है। ऊर्जा का बेहतर उपयोग करने से उत्पादन लागत और उत्सर्जन कम करने में सहायता मिल सकती है।
7. Mission LiFE
Mission LiFE यानी Lifestyle for Environment लोगों को पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इसमें ऊर्जा और पानी बचाना, कचरा कम करना तथा जिम्मेदारी से उपभोग करना शामिल है।
8. Green India Mission
इस मिशन का उद्देश्य वन क्षेत्र और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण एवं सुधार को बढ़ावा देना है। जंगल कार्बन को संग्रहित करने और जैव विविधता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
9. FAME India Scheme
FAME योजना का संबंध इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों को बढ़ावा देने से रहा है। ऐसे वाहन परिवहन क्षेत्र में तेल पर निर्भरता और उत्सर्जन कम करने में मदद कर सकते हैं। किसी भी समय लागू योजना की स्थिति और पात्रता के लिए आधिकारिक सरकारी जानकारी देखनी चाहिए।
10. Ethanol Blending Programme
इस कार्यक्रम के अंतर्गत पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को बढ़ावा दिया जाता है। इसका उद्देश्य ईंधन के विकल्पों को बढ़ाना और पेट्रोलियम ईंधन पर निर्भरता कम करने में सहायता करना है। इसके पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन उत्पादन प्रक्रिया और कच्चे माल के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
Emissions Intensity और Absolute Emissions में अंतर
भारत की जलवायु नीति को समझने के लिए इन दोनों शब्दों का अंतर जानना जरूरी है।
- Emissions Intensity: अर्थव्यवस्था के आकार या GDP की प्रत्येक इकाई के मुकाबले होने वाला उत्सर्जन।
- Absolute Emissions: किसी देश या क्षेत्र से कुल होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन।
उदाहरण के लिए, यदि किसी देश की GDP तेजी से बढ़ती है और प्रति इकाई GDP उत्सर्जन कम होता है, तो भी कुल उत्सर्जन बढ़ सकता है। इसलिए उत्सर्जन की तीव्रता में सुधार और कुल उत्सर्जन में बदलाव को अलग-अलग समझना चाहिए।
जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में प्रमुख चुनौतियाँ
1. Climate Justice यानी जलवायु न्याय
सभी देशों की ऐतिहासिक उत्सर्जन जिम्मेदारी, आर्थिक स्थिति और तकनीकी क्षमता समान नहीं है। विकासशील देशों का कहना है कि जलवायु कार्रवाई के साथ गरीबी कम करने, रोजगार पैदा करने और ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाने जैसी जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
2. Climate Finance यानी जलवायु वित्त
स्वच्छ ऊर्जा, नई तकनीक, जलवायु अनुकूल बुनियादी ढाँचे और आपदा से निपटने के लिए बड़े निवेश की जरूरत होती है। विकासशील देशों को सस्ती और भरोसेमंद वित्तीय सहायता उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है।
3. Carbon Removal की अनिश्चितता
वातावरण से बहुत बड़ी मात्रा में CO₂ हटाने के लिए जिन तकनीकों की जरूरत होगी, उनकी लागत, क्षमता और दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर अनिश्चितताएँ हैं। इसलिए उत्सर्जन घटाने का काम भविष्य की तकनीकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
4. उद्योग और व्यापार पर प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कार्बन उत्सर्जन से जुड़े नियम सख्त हो रहे हैं। भारत जैसे देशों के उद्योगों को ऊर्जा दक्षता सुधारने, उत्सर्जन मापने और स्वच्छ तकनीक अपनाने की जरूरत होगी। इससे उद्योगों की लागत, निर्यात और प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है।
5. वादों और वास्तविक कार्रवाई के बीच अंतर
किसी देश का Net Zero लक्ष्य घोषित करना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक बदलाव के लिए स्पष्ट नीतियाँ, निवेश, तकनीकी क्षमता, निगरानी और नियमित समीक्षा जरूरी हैं।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए क्या उपाय जरूरी हैं?
वैश्विक स्तर पर
- देश अपने जलवायु लक्ष्यों को मजबूत करें और उन्हें लागू करने के लिए स्पष्ट योजनाएँ बनाएं।
- सौर और पवन ऊर्जा जैसी स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार करें।
- ऊर्जा दक्षता बढ़ाकर अनावश्यक ऊर्जा खपत कम करें।
- मीथेन और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाएँ।
- जंगलों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करें।
- विकासशील देशों को जलवायु वित्त और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराएँ।
भारत के लिए
- नवीकरणीय ऊर्जा और बिजली भंडारण की क्षमता बढ़ाना।
- स्टील, सीमेंट और अन्य भारी उद्योगों में स्वच्छ तकनीक अपनाना।
- सार्वजनिक परिवहन और उपयुक्त इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देना।
- कचरा प्रबंधन और कृषि से होने वाले उत्सर्जन को कम करना।
- जल संरक्षण, आपदा तैयारी और जलवायु अनुकूल कृषि में निवेश करना।
- स्वच्छ ऊर्जा के साथ रोजगार, सस्ती बिजली और विकास की जरूरतों का संतुलन बनाए रखना।
निष्कर्ष
UNEP Emissions Gap Report 2026 दुनिया को चेतावनी देती है कि वर्तमान जलवायु नीतियाँ वैश्विक तापमान वृद्धि को सुरक्षित स्तर पर सीमित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। 1.5°C की सीमा पार होने का जोखिम अब बहुत अधिक है, लेकिन तेजी से उत्सर्जन घटाने से तापमान वृद्धि की सीमा और अवधि कम की जा सकती है।
भारत के लिए स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार, उद्योगों में उत्सर्जन कम करना, ऊर्जा दक्षता बढ़ाना और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की तैयारी करना महत्वपूर्ण है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और न्यायसंगत जलवायु वित्त भी जरूरी होंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. UNEP Emissions Gap Report 2026 क्या है?
यह संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की वार्षिक रिपोर्ट है, जो मौजूदा जलवायु नीतियों और तापमान लक्ष्यों के लिए जरूरी उत्सर्जन कटौती के बीच अंतर बताती है।
2. रिपोर्ट का मुख्य संदेश क्या है?
मौजूदा नीतियों के तहत 1.5°C की सीमा पार होने की आशंका है। तेजी से उत्सर्जन घटाना जरूरी है, ताकि तापमान वृद्धि सीमित रहे और सदी के अंत तक वापस 1.5°C तक आने की संभावना बनी रहे।
3. 2035 तक उत्सर्जन में कितनी कटौती जरूरी है?
रिपोर्ट के सबसे कम ओवरशूट वाले रास्ते में 2025 के स्तर की तुलना में 2035 तक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 45% कटौती जरूरी बताई गई है।
4. NDC का क्या अर्थ है?
NDC का पूरा नाम Nationally Determined Contribution है। यह पेरिस समझौते के तहत किसी देश की जलवायु कार्रवाई और उत्सर्जन घटाने से जुड़ी राष्ट्रीय योजना है।
5. CBDR-RC क्या है?
CBDR-RC का पूरा नाम Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities है। इसका अर्थ है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी सभी देशों की है, लेकिन उनकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी और क्षमता अलग-अलग हो सकती है।
6. भारत के लिए जलवायु वित्त क्यों जरूरी है?
जलवायु वित्त से स्वच्छ ऊर्जा, नई तकनीक, अनुकूलन उपायों और पर्यावरणीय बुनियादी ढाँचे में निवेश करने में मदद मिल सकती है। यह विकास की जरूरतों और उत्सर्जन घटाने के बीच संतुलन बनाने में सहायक है।
आधिकारिक स्रोत
- UNEP – Emissions Gap Report 2026
- UNEP – रिपोर्ट की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति
- UNFCCC – Nationally Determined Contributions (NDCs)
यह लेख शैक्षिक और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। रिपोर्ट के आंकड़ों और सरकारी योजनाओं की नवीनतम स्थिति के लिए संबंधित आधिकारिक स्रोत देखें।

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